घासीलाल हलवाई ने मुझे लाड लड़ाया

मेरी मॉम  कोंकणा सेन सनातनधर्म कन्या विद्यालय बेलारानी भोसले की स्कूल में शारीरिक शिक्षा और डांस की टीचर है। मेरा नाम ललिता है जो बंगाली भाषा में लोलिता बोला जाता है पर प्यार का नाम ‘लोली’ है। स्कूल के सामने एक छोटा-सा बाज़ार है। छोटी कद के कारण सब मुझे लोली ही कहते हैं तो कुछ ‘गुड़िया’ भी। मेरी मॉम कदकाठी में भले ही छरहरी हो पर बहुत स्वस्थ है। मेरी भी  नियम से वर्जिश व मालिश होने से शरीर मे गठन, लोच और ललक है। इसलिए जब भी किसी को मुझे  ”प्यार ” करना होता है वो मुझे अपनी गोद में बिठाकर ही प्यार करता है।खासकर मेरी मॉम के पास आनेवाले अंकल लोग। मॉम स्वतंत्र विचारों की है,इसलिए मुझे भी खेलने-कूदने की स्वतन्त्रता मिली हुई है।

मुझे नमकीन और मिठाई खाने का बहुत शौक है। स्कूल के सामने जब भी गरम नमकीन या ताज़ा मिठाई बनती है मेरी ललचाई नज़र उस पर गड़ जाती है। उस दिन मैं  स्कूल की छुट्टी होने के बाद देर से घर जाती हूँ।घासीलाल हलवाई की दूकान की दूर से ही सुगंध आ जाती है कि आज ताज़ा माल बन रहा है। उस वक्त मैं वहाँ संभल के खड़ी हो जाती हूँ। घासीलाल हलवाई मोटे-ताज़े तगड़ी कदकाठी के हैं, वे प्रायः अपनी धोती जांघों तक समेट और सिर्फ बनियान पहने दूकानदारी करते हैं। घासीलाल हलवाई के माल का चस्का लेने के लिए मेरे हाथ में एक 10 रुपये का नोट होता है।

ये जो मैं बताने जा रही हूँ सही सच है।मुझे दूकान की गरम कड़ाही के सामने देख उसने ताड़ लिया कि मुझे चाहिए। उस समय वहाँ गरम -गरम मिर्चीबड़े बन रहे थे। उसने इशारे से मुझे दूकान के भीतर बुलाया तो मैं चली गई।वो अपने नौकर से बोला: ‘कलवा, थोड़ी कड़ाही सम्हाल, मैं बिटिया को कुछ खिला-पिला दूँ।’ मैंने अपने दोनों हाथ अपनी स्कर्ट के पीछे कर लिए थे।मैं एकदम तन कर खड़ी थी जिससे मेरे टॉप्स के उभार और ऊंचे हो गए थे। शायद घासीलाल का ध्यान उस ओर गया हो।वह बैठने का मुड्डा उठाने नीचे झुका तो मेरा भी ध्यान उसकी जांघों के पिछवाड़े व नितंबों पर गया जो पुष्ट, भारी, व मोटे थे।वह अब मुड्डे पर पैर फैला कर बैठ गया था, उसने मुझे बुलाया तो मैं जाकर उसकी दोनों टांगों के बीच खड़ी हो गयी।वह हँसते हुये बोला: ”गुड़िया, आओ बैठो; सब खिलाता हूँ।” उसने गोद में बैठने का इशारा किया तो मैं  उसकी गोद में बैठ गई।

उसने एक गरमागरम मिर्ची बड़ा मंगवाया, यह आम मिर्चीबड़े से थोड़ा लंबा व मोटा था।उसका नीचे का सिरा कुछ ऐसा था जो मुंह में जाने को आसान था। घासीराम ने अपनी एक जांघ कसमसाई , फिर प्यार से मेरा एक गाल सहलाया और मिर्चीबड़े का नीचे का सिरा मेरे ओठों पर लगाकर पूछा: ‘गुड़िया, ये ज्यादा गरम तो नहीं है? ‘ मैंने हाथ से पूरा मिर्चीबड़ा सहलाया और कहा: ‘अंकल! थोड़ा गरम तो है!’ वो बोला: ‘ इसे गरमागरम खाने में ही मज़ा आता है! ले, ओठ खोल, मैं गरम-गरम ही तेरे मुंह में टेकूँ। ‘ जैसे ही मैंने मुंह खोला उसने थोड़ा-सा अंदर टिका दिया, फिर एकदम से निकाल लिया। पूछा : ‘ इसे लाल मिर्च की चटनी के साथ खाओगी, लल्ली?’ मैं कुछ बोली नहीं। उसने चटनी लपेट मेरे मुंह में अंगुली की।इसी समय मुझे लगा जैसे घासीराम नीचे से मेरी स्कर्ट उघाड रहा हो।मैंने उसे तूल नहीं दिया बल्कि मैं कुछ ऊंची हो गयी ताकि हलवाई ये काम आसानी से कर सके। जब बैठी तो मुझे अपने चूतड़ों पर किसी कठोर पर लिजलिजी चीज़ का एहसास हुआ।मगर मुझे भी मिर्चीबड़े का चस्का चाहिए था इस वास्ते मैंने एतराज नहीं किया।घासीराम ने अब एकदम से दो इंच मिर्चीबड़ा मेरे मुंह में घुसा दिया और मैं उसे चाव से चाटने, चूँसने व कुतरने लगी। यह चीज़ मुझे इतनी अच्छी लगी कि मैं अपनी दोनों टांगें हिला-हिला मिर्चीबड़े का मज़ा लेने लगी। ठीक इसी वक्त घासीलाल ने हिम्मत करके मेरे दोनों चूतड़ ऊपर किए, अपनी धोती की लाँग ढीली की और तब मैंने महसूस किया कि वो अब नंगा हो चुका है,क्योंकि उसका लिंग मेरी पेंटी से टकरा रहा था। इस समय तक मैं एक-तिहाई मिर्चीबड़ा अपने मुंह में धकेल चट कर चुकी थी। उसका तीखापन व उसके मसाले का स्वाद निराला था। हालांकि मैं मुंह से ”सी-सी” भी कर रही थी।घासीलाल अंकल ने अब मिर्चीबड़े का मोटेवाला भाग मेरे अंदर किया जो मेरी जीभ व दांतों में फंस गया था। मुझे मज़ा आ रहा था। इसे समझ वो अब मेरे टॉप्स के भीतर के मम्मे सहलाने लगा, यही नहीं उसने तो होशियारी से मेरी नन्ही पेंटी भी खोल दी। पहली बार मुझे पता लगा कि पुरुष का लंड कैसे गुदगुदाता है!सच कहूँ तो घासीलाल का मोटा लंड मेरी गांड के दोनों गोलकों पर व भीतर की चमड़ी पर टक्कर मार रहा था। इस तरह से मैंने मिर्चीबड़ा खाने का पूरा मज़ा लिया।

यह कहना पड़ेगा कि घासीलाल हलवाई ने उस दिन मुझे सिर्फ गरम मिर्चीबड़ा ही नहीं खिलाया बल्कि बाद में मेरे हलक की जलन दूर करने उसने गरम लंबूतरे गुलाबजामुन व कालेजामुन भी खिला- खिला मुझे प्यार किया। जब मैं उसकी गोद से उठी तो मैं अपनी जमीन आर गिरी पेंटी उठाना भूल ही गयी। मेरे टॉप्स भी खुल चुके थे। दरअसल मैं गरम गुलाबजामुन के चटकारे लेना चाहती थी। घासीलाल मेरी इच्छा पहचान बोला: ”चल, मुन्नी ! इधर खुल्ला है, भीतर चलते हैं , तुझे मीठा-मीठा गरम-गरम मिलेगा!’

वो कमरा छोटा था पर वहाँ से हमें कोई देख नहीं सकता था। वहाँ सोफा भी थाऔर एक छोटी टेबल भी। सब आड़ में था। एक प्लेट में एक लंबूतरा गुलाबजामुन व दो गोल-गोल कालेजामुन थे।मैं भी पहले की तरह घासीलाल कि दोनों टांगों के बीच आ गयी थी, मेरा सोचना था अंकल पहले की तरह मुझे फिर अपनी गोद में गिराएँगे।घासीलाल ने झट से मेरा स्कर्ट ऊंचा किया और ‘बेटी, बेटी’ कहते हुये मेरी नंगी गांड से चिपट गया। इतना ही नहीं वो भी नीचे से पूरा मादरजात नंगा था। उसकी उम्र 48 की रही होगी, पर मुझे क्या? मुझे तो गरम मिठाई से मतलब था। मैंने सोचा अगर मैं घासीलाल को उसकी मनमर्जी करने दूँ तो मुझे रोज-रोज चटकारा मिलेगा, वो भी मुफ्त में। इसलिए मैंने लजाते हुये अपना सिर नीचा कर लिया। हलवाई अंकल सब समझ गया। उसने झपट्टा मर मेरे टॉप्स-ब्रा सब निकाल फेंके, स्कर्ट भी खोल दूर किया। मेरी सांसें तेज-तेज चलने लगीं। घसीलाल ने मेरी एक टांग उठाई और अपनी एक अंगुल भक-से मेरी चूत में सरका दी। एक सिसकारी मेरे मुंह से निकली। घासीलाल मुझसे बोला: ”मुन्नी, किसी से कहना मत, ले मेरा नंगा लंड पकड़ सहला हौले-हौले।” तब मैंने भी उसका लौड़ा पकड़ लिया। आह, क्या गरम-गरम फुफकार मारता लौड़ा था, कमसे कम 7 इंच का। पहली बार किसी मर्द का लंड देखा। वह नीचे झुका, मेरी जांघें भरपूर चौड़ी कर मेरी चूत में मुंह मारने लगा।उस समय पता नहीं क्या सोच कर मैं घासीलाल की मोटी गांड सहलाने लगी। सबसे मस्त बात ये थी कि जब मैं मुंह भर कर गरम-गरम गुलाबजामुन खा रही थी वो मेरी चूत में अपना लंड ठोंक-ठोंक मुझे चोद रहा था।उसके लंड के इर्दगिर्द घनी झांटें थीं। एक बार वो मेरे नंगे शरीर पर चढ़ा तो दूसरी बार उसने मुझे अपनी जांघों से चिपटा, पेट पर चढ़ा चोदाबाटी की। अब मैं उसके काले जामुन खाने लगी– और वो मेरे दोनों मम्मे मुंह में दाब, छूँछी चूँसते मुझे लंड से चोदे जा रहा था; आह, घासीलाल हलवाई , तूने ही पहली बार मेरी कमसिन फुद्दी में लंड की बेशर्म ठुकाई की!

Comments