जिंदगी का सफर दीदी के साथ भाग 1

हेलो दोस्तों मैं संजय सिंह अपनी जिंदगी का सफर आपको सुनाने जा रहा हूँ .……
मैं संजय एक मिडिल क्लास फैमिली का लड़का हूँ अभी मेरी उम्र 28 साल है पर ये कहानी शुरू होती है मेरे जन्म के पहले से मेरे पिताजी राजप्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में रहते थे पापा की एक ऑटो पार्ट्स की दुकान थी जो बढ़िया चलती थी और वो अच्छा खासा कमा लेते थे।
फिर पापा की शादी हुई मेरी माँ के साथ मेरी माँ सरला अपने नाम के अनुसार ही बहुत सीधी सादी घरेलू महिला थीं और उनकी शादी के ठीक एक साल बाद जन्म हुआ मेरी बहन रुचि का और उसके डेढ़ साल बाद मेरा …. हमारा छोटा सा प्यारा परिवार हंसी खुशी अपनी जिंदगी का सफर तय कर रहा था …. पापा हम सब की खुशियों का पूरा ख्याल रखते और हमारी माँ तो दुनिया की सब से अच्छी माँ थी सब कुछ एकदम बढ़िया चल रहा था पर शायद किस्मत को हमारे परिवार की खुशियां पसन्द नहीं थी एक दिन पापा की तबियत खराब हुई …. लोकल में डॉक्टर्स को दिखाया इलाज भी करवाया पर कोई खास फायदा नही हुआ फिर एक पारिवारिक मित्र की सलाह पर पापा को दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में दिखाया गया और फिर हम सब पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा … डॉक्टर ने बताया कि पापा को कैंसर है और वो मुश्किल से 6 महीने और जी पाएंगे वैसे तो हमारी आर्थिक स्थिति ठीक ठाक ही थी पर कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में 6 महीने में ही जो भी जमा पूंजी थी वो जाती रही उस वक़्त दीदी इंटर में और हाइस्कूल में पढ़ रहे थे फिर एक दिन पापा हमे छोड़ कर चले गए घर मे एक पापा ही कमाने वाले थे उनके ना रहने पर हमारी हालत बहोत बुरी हो गयी रिश्तेदारों ने भी हमे हमारे हाल पर छोड़ कर मुह मोड़ लिया मम्मी इस सदमे से रो रो कर बेहाल थीं … हम भाई बहन भी इन स्थितियों से बेहद दुखी थे ….. जैसे तैसे मम्मी ने खुद को सम्हाला और एक स्कूल में टीचर की नौकरी की और किसी तरह हमारी पढ़ाई जारी रही पर 3000 की तनख्वाह में दो बच्चो को पालना और उनकी पढ़ाई हो नही पा रही थी …. फिर एक दिन मम्मी के भाई यानी हमारे मामा जी घर आये और मम्मी से बंद कमरे में काफी देर बातें करते रहे ……. उनके अगले दिन जाने के बाद मम्मी ने बताया कि वो रुचि के लिए रिश्ता ले कर आये थे लड़का उन्ही के गांव का है और 40 बीघे जमीन का मालिक है बस लड़के की उम्र 38 साल है और उसकी पहली बीवी मर चुकी है।
ये सुन कर दीदी एकदम से अपसेट हो गईं और कहने लगी कि इतनी बड़ी उम्र का लड़का कहाँ हुआ पर मम्मी ने उनको डांटते हुए कहा 19 कि हो गयी हो बच्ची नही हो मेरे पास पैसे नहीं है कैसे करूंगी तेरी शादी लड़के की उम्र ज्यादा है तो क्या हुआ प्रॉपर्टी तो है सुखी रहोगी ….. बाकी वैसे तो लड़की की शादी में 5-7 लाख लगते है पर ये लोग बिना पैसे के सिर्फ लड़की मांग रहे हैं ये तो तेरी किस्मत है कि घर बैठे ऐसा रिश्ता आया है वरना मैं तो चिंता में घुली जा रही थी कि कैसे होगी तेरी शादी दीदी जितना विरोध कर सकती थी किया पर मम्मी ने अपना फैसला सुना दिया कि शादी वहीं होगी …..
फिर हफ्ते भर बाद वो लोग दीदी को देखने आए लड़के का नाम किशनपाल था और उनके साथ उनके माँ बाप और छोटा भाई आया था उसकी माँ एक बेहद तेज और झगड़ालू किस्म की औरत लगी मुझे और उसका बाप एकदम दब्बू किस्म का उसकी आवाज़ ही नही निकल रही थी दीदी के सामने और वो खुद 5 फीट का दुबला सा एकदम काला सर के बाल उड़े हुए शक्ल से ऐसा लग रहा था जैसे वो कोई नशा करता हो …. मम्मी ने एक बार उसकी माँ से इस बारे में पूछा भी तो वो कहने लगी चाय तक नही पीता है मेरा बेटा कोई दुर्गुण दूर दूर तक नही है उनके लड़के में …. हाँ उसका छोटा भाई जो 26-27 साल का था और कहीं से भी उसका भाई नही लग रहा था वो एक ठीक ठाक स्वस्थ सभ्य इंसान लग रहा था और उसका बात चीत का लहजा भी अच्छा था। खैर सारी औपचारिकता के बाद उन लोगों ने कहा कि लड़की पसन्द है और पसन्द भी क्यों ना होती मेरी रुचि दीदी 19 साल की एकदम गोरी भरे हुए बदन की थी बड़ी बड़ी काली आंखे लंबे बाल लंबी गर्दन और एकदम आकर्षक थी मेरी दीदी।
मुझे वो इंसान एकदम पसन्द नही आया खास कर जब दीदी के साथ उसकी तुलना की तो जोड़ी यू लगी जैसे करिश्मा कपूर के साथ शक्ति कपूर पर ना मैं कुछ कर सकता था ना दीदी और मम्मी ने रिश्ता पक्का कर दिया।
फिर अगले महीने ही एक मंदिर में कुछ रिश्तेदारों की उपस्थिति में दीदी की शादी उस इंसान से हो गयी जिसे दीदी ने कभी पसन्द नहीं किया और दीदी अपनी ससुराल चली गयी ….. अब मैं और माँ ही बचे थे और मम्मी ने एक दिन मुझे बिठा कर समझाया कि संजय अब तुम मेरे सहारे हो और मैं चाहती हूं तुम खूब पढ़ो और पढ़ लिख कर अपने पापा जैसे सफल इंसान बनो वैसे हम भाई बहन दोनों ही पढ़ाई में काफी होशियार थे पर मम्मी के समझाने के बाद मुझे अपनी जिम्मेवारियों का अहसास अच्छे से हुआ और मैं एकदम पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगा दिया परिणाम ये हुआ कि मैं इंटर में 91% मार्क्स ला कर अपने जिले में प्रथम आ गया उस दिन मम्मी बहोत खुश थीं। फिर आगे की पढ़ाई के लिए मैंने एजुकेशन लोन करवा लिया और दिल्ली आ गया। मेरे अंदर एक जुनून सा था की कैसे भी जल्दी से जल्दी मुझे पैसे कमाने हैं और मम्मी का काम छुड़वाना है उन्होंने बहोत दुख उठाये थे हमारे लिए और अब मैं अपना फर्ज निभाना चाहता था। दिल्ली में 4 साल तक पढ़ाई करते हुए मैंने पार्ट टाइम जॉब की ट्यूशन पढ़ाये और साथ ही नौकरी के लिए कोशिश भी करता रहा वो चार साल मैंने दिन रात मेहनत की और फिर एक दिन मेरी मेहनत रंग लाई और मेरा सलेक्शन एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर के पद पर हो गया …..
उस दिन मैं बहोत खुश था मुझे 20 दिन बाद अपनी पोस्ट जॉइन करनी थी और मैंने फटाफट घर की टिकट बुक कराई ….. अपने पार्ट टाइम जॉब से मैंने कोई 20000 रुपये इकठ्टा किये हुए थे वो बैंक से निकाल कर मार्केट गया दो अच्छी सी साड़ियां ली और ट्रेन पकड़ कर अपने शहर पहुंच गया।
आज पूरे 4 साल बाद अपना शहर जो अब एकदम नया और बदला सा लग रहा था पहुंच कर मैं बहोत खुश था ….मैंने एक मिठाई की दुकान से रसगुल्ले लिए और जल्दी से घर की ओर निकल पड़ा घर पहुंच कर दरवाजा खटखटाया तो माँ ने आ कर दरवाजा खोला और माँ की हालत देख कर मेरी आँखों मे आंसू आ गए वो बहोत बूढ़ी और बीमार लग रही थी मैंने उनके पैर छुए तो कुछ समय मुझे पहचानने में लगा उन्हें पर मुझे देख कर वो बहोत खुश थी और जब मैंने बताया की मैं बैंक मैनेजर बन गया हूँ तो खुशी से उनके आंसू निकल पड़े फिर मैंने उन्हें मिठाई खिलाई और साड़ी दी और कहा कि माँ अब आज से तुम्हारा काम करना बंद तुम सिर्फ आराम करोगी और मैं हर महीने तुम्हे पैसे भेज दिया करूँगा और जल्दी ही मैं दिल्ली में फ्लैट लेकर तुम्हे अपने साथ ले चलूंगा ये सुन कर उनके चेहरे पर खुशी झलकने लगी।
फिर ढेर सारी बातों के बाद मैंने रुचि के हाल पूछे तो माँ ने बताया शादी के बाद वो सिर्फ दो बार यहां आयी थी अपने पति के साथ उसका पति उसे कभी यहाँ नही आने देता और जब वो आयी थी तब बहोत दुखी थी फिर माँ भी उसकी फिक्र में बीमार सी हो गयी और अपना तो कोई था नही जो इन लोगों की फिक्र करता ये सब सुन कर मुझे बहोत दुख हुआ और गुस्सा भी आया कि काश मैं इस लायक होता तो दीदी को उस अधेड़ इंसान के पल्ले कभी ना बांधता।
फिर खा पी कर रात में मैंने माँ से कहा कि कल मैं दीदी के यहां जाऊंगा माँ ने कहा कि वो भी यही चाहती हैं कि मैं जा कर उनके हाल पता करूँ कैसी है वो।
सुबह उठ कर मैं अपने बचपन के दोस्त रवि के यहां गया उसकी भी शादी हो गयी थी और एक बच्चे का बाप बन गया था और उसकी साइकिल की दुकान थी वो मुझे देख कर खुश हुआ और मेरी जॉब की बात सुन कर उसने कहा भी की संजय तुम्हारी माँ ने बहोत कुछ किया है अब उनका ख्याल रखना खैर वो तो मैंने खुद ही सोच रखा था पर वहां जाने से एक फायदा ये हुआ कि रवि की ससुराल भी उसी गाँव मे थी कहाँ दीदी ब्याही थीं तो दीदी के काफी हाल उस से ही मिल गए उसने बताया कि मेरा जीजा जो कि एक नंबर का शराबी और अय्याश आदमी है और उसने मेरी दीदी का जीवन नरक बना रखा है सुबह से शाम तक काम और उसके बाद शराब पी कर पिटाई ये सब रोज का काम है उस घर का और ऊपर से वो दीदी की चुड़ैल जैसी सास जो बात बात पर दीदी को गालियां देती और मारती है ये सब सुन कर मेरी आँखें गुस्से से लाल हो गईं और मैंने रवि को बोला मुझे अभी दीदी के पास जाना है रवि ने दुकान पर अपने पिताजी को बिठाया और बाइक से मुझे अपने साथ ले कर चल पड़ा दीदी की ससुराल शहर से एक घंटे की दूरी पर थी और हम जल्दी ही उनके यहां पहुंच गए …… मैं तो पहली बार ही आया था उस गांव में देखा कि दीदी का घर एक कच्चा छप्पर वाला घर था और बाहर 3 भैंसे बंधी हुई थी उनके ससुर बाहर पड़ी खाट पर बैठे बीड़ी पी रहे थे मैंने जा कर उनसे नमस्ते की और अपना परिचय दिया तो उन्होंने वहीं से राजू(दीदी के देवर) आवाज़ दी वो दो आवाज़ों के बाद अंदर से आया और मुझे देख कर नमस्ते की फिर दीदी के ससुर ने उसे बताया कि मैं कौन हूँ तो उसने घूर कर मुझे देखा उसके देखने का तरीका मुझे अच्छा नही लगा।
मैंने उस से पूछा दीदी कहाँ है मुझे उनसे मिलना है तो उसने कहा मेरे साथ आओ मैं अंदर गया …. एक कमरे को पर कर के हम आंगन में पहुंचे तो देखा दीदी आंगन में ढेर सारे बर्तन धोने में लगी है दीदी ने एक पुरानी सी साड़ी पहनी हुई थी और उनका गोरा चेहरा सूख कर मुरझा सा गया था तभी अंदर कहीं से दीदी की सास की कर्कश आवाज़ आयी कि जल्दी जल्दी हाथ चला अभी दोपहर का खाना बनाना बाकी है ….. दीदी और तेजी से बर्तन में हाथ मारने लगी …. ये सब देख कर मुझे रोना सा आ गया तभी बाहर की ओर से दीदी का पति लडख़ड़ाता हुआ अंदर आया और एक कमरे में घुस गया और दहाड़ते हुए बोला जल्दी से अंदर आ रण्डी तुझे कितनी बार कहा है मेरे घर आते ही सीधी मेरे पास आया कर तभी जीजा का भाई उसी कमरे में घुस गया और शायद उन्हें मेरे बारे में बताने लगा कि मेरे सामने ज्यादा ड्रामा ना करें तो वो अंदर से चिल्लाता हुआ बोला आया होगा भोसड़ी वाला मैं किसी से नही डरता मेरी बीवी है।
मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं सीधा उसी कमरे में घुस गया दीदी भी भाग कर मेरे पीछे आ गयी और मैंने अंदर जा कर उस शराबी का कॉलर पकड़ कर उसे खड़ा किया और 4-5 थप्पड़ पूरी ताकत से उसके गाल पर रसीद कर दिए और उस से दुगनी आवाज़ में दहाड़ता हुआ बोला ….. मादरचोद वो तेरी बीवी है तो मेरी बहन भी है और दोबारा उसे एक भी अपशब्द कहा तो तेरी जान ले लूंगा मैं इन शराबियों की एक खास आदत होती है जब तक इनकी सुनते रहो ये शेर बनते हैं पर जैसे ही इन्हें चार हाथ लगा दो ये भीगी बिल्ली बन जाते हैं।
चार थप्पड़ पड़ते ही उसका सारा नशा उतर गया और वो गाल सहलाते हुए चारपाई पर बैठ गया तभी दीदी की सास भन्नाते हुए कमरे में दाखिल हुए और बड़ी तेज आवाज में बोली तूने कैसे मेरे बेटे पर हाथ उठा दिया इतनी हिम्मत कैसे हो गयी तेरी की हमारे घर मे घुस कर हमी से धौंस दिखा रहा मैंने फिर से दो थप्पड़ पूरी ताकत से उस शराबी के गाल पर लागये और कमरे में आवाज़ गूंज गयी थप्पड़ों की और चीख कर बोला देखा साली ऐसे उठाया मैंने हाथ और फिर मैंने फ़ोन निकाल कर कहा कि अभी पुलिस बुला कर तुम सब को महिला उत्पीड़न में जेल भिजवाता हूँ ये सुनते ही वो सारे एकदम से डर कर हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे और बोले बेटा हमे माफ कर दो अब दोबारा ऐसी गलती नही होगी …. और मेरी दीदी ये सब देख कर सहमी सी एक ओर चुपचाप खड़ी थी मैंने कहा मुझे दीदी से अकेले में बात करनी है तो उनकी सास बोली बहू अपने भाई को पीछे वाले कमरे में ले जाओ और तुम दोनों बातें करो मैं चाय भिजवाती हूँ …. दीदी मुझे ले कर उस कमरे में आई वो एक छोटा सा कमरा था जिसमें एक चारपाई पड़ी थी उस पर मैला से गद्दा और कोने में एक बक्सा रखा हुआ था मैं चारपाई पर बैठ गया और दीदी वही बक्से पर बैठ गयी ….. दीदी हैरत से मुझे देखे जा रही थी उन्हें यकीन ही नही हो रहा था कि मैं आया हूँ।
मैंने कहा क्या हुआ दीदी मैं संजय हूँ तुम्हारा छोटा भाई तो दीदी एकदम फफक कर रोने लगी और बोली मेरे भाई कहाँ थे तुम कितने दिन में तुम्हे अपनी दीदी की याद आयी … मैंने उन्हें सब बताया की कैसे मैंने दिल्ली में रह कर अपनी पढ़ाई की और किस तरह दिन रात मेहनत कर के आज किसी काबिल बना हूँ कि अपने परिवार के दुख दर्द दूर कर सकूं फिर मैंने दीदी से पूछा दीदी तुम यहाँ खुश नही हो ना तो दीदी ने आंसू पोंछते हुए कहा उस से क्या फर्क पड़ता है अब तो यही मेरी किस्मत है …. मैंने कहा दीदी बस कुछ महीने और काट लो किसी तरह मैं दोबारा आऊंगा और फिर तुम चाहो तो हमेशा के लिए ये सब छोड़ कर मेरेस साथ चलना बाकी तब तक के लिए मैं ऐसा इंतजाम कर दूंगा की ये लोग तुम्हारे साथ कोई भी बदतमीजी नही करेंगे ….. फिर मैंने रवि को फोन किया वो अपनी ससुराल में था जो उसी गांव में थी मैंने उस से कहा तुरंत शहर जा कर एक फ़ोन सिम डलवा कर ले आये और मुझे दे वो शहर निकल गया।
तब तक दीदी की सास चाय और बिस्किट ले कर आई और रख कर चली गयी मैंने चाय पीते हुए दीदी से ढेर सारी बातें की तो दीदी ने कहा माँ से मिलने का बहोत मन होता है तो मैंने कहा तुम घर जा कर माँ से क्यों नही मिलती कभी तो दीदी ने बताया की शादी के बाद दो बार तो ये ले कर गए बहोत कहने पर उसके बाद जब भी घर जाने की बात की सिर्फ गालियां और मार मिलती आखिर हार कर उन्होंने कहना ही बंद कर दिया।
मैंने कहा चलो अब आज से तुम्हारे दुख खत्म हो जाएंगे और तुम आज ही मेरे साथ घर चलोगी दीदी बोली ये लोग नही जाने देंगे गुस्से में मेरे मुह से निकला इनकी माँ का भोसड़ा ये मादरचोद क्या रोकेंगे मैंने कहा तुम तैयार हो बाकी चिंता ना करो मैं ले के जाऊंगा तुम्हे।
दीदी ने कहा पहले पूछ लो मैंने कहा जितना कह रहा हूँ उतना करो और उठ कर बाहर आ गया दीदी की सास वही आंगन में खड़ी हमारी बातें सुनने की कोशिश कर रही थी मुझे देख कर वो एकदम सकपका गयी मैंने कहा मैं दीदी को अपने साथ ले जा रहा हूँ वो माँ से मिलना चाहती हैं वो फौरन बोली ठीक है बेटा ले जाओ काफी दिन से गयी भी नही अपने मायके मैंने वहीं से आवाज़ दे कर कहा दीदी तैयार हो जाओ और बाहर आ गया .……
बाहर दीदी का ससुर चारपाई पर पड़ा था मुझे देखते ही उठ कर खड़ा हो गया और बोला जा रहे हो क्या बेटा मैंने कहा इतनी जल्दी क्या है चला जाऊंगा पर तुम इतना समझ लो आज के बाद इस घर मे मेरी बहन को जरा भी तकलीफ हुई या उसके साथ कोई बदसलूकी हुई तो मैं तुम सबका जीना मुश्किल कर दूंगा सारी जिंदगी जेल में सड़ोगे तुम सब वो बोला बेटा सारा किया धरा उसकी सास का है मैं तो कभी एक शब्द नही बोलता बहु को मैंने कहा अपनी बीवी और लौंडो को समझा देना अच्छे से और आज मैं दीदी को ले के जा रहा हूँ वो बोले ठीक है बेटा ले जाओ तब तक दीदी तैयार हो गयी थीं और जीजा भी बाहर आ गया था वो सर झुकाए चुपचाप एक कोने में खड़ा था।
मैंने कहा जाओ दीदी को बुला कर लाओ तो वो अंदर गया और 5 मिनट बाद दीदी के साथ बाहर आया अब दीदी की हालत कुछ ठीक लग रही थी उन्होंने एक हरी रंग की सस्ती सी साड़ी पहनी थी और कोई मेकअप नही किया था पर इस नरक से बाहर निकलने की खुशी उनके चेहरे पर देखी जा सकती थी तब तक रवि भी आ गया उसने बाइक लगा कर मुझे जेब से निकाल कर एक फ़ोन दिया जिसे मैंने उन लोगो के सामने दीदी को दिया और कहा कि दीदी ये फ़ोन अब से अपने पास रखना मैं रोज सुबह शाम तुम्हे फ़ोन करूँगा और अगर एक भी दिन मेरी तुमसे बात नही हुई या फोन बंद मिला तो मैं एक घंटे में पुलिस के साथ यहां आ कर इन लोगो की वो हालात करूँगा की ये अपने जन्म को कोसेंगे ये सुन कर उन सब के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगी। फिर मैंने जीजे के भाई से उसका नंबर लिया और बोला कि जब मेरा या दीदी का फ़ोन आये आ के ले जाना दीदी को उसने सर हिलाते हुए हां बोला और मैंने रवि से कहा कि मैं बाइक ले जा रहा हूँ वो किसी और जुगाड़ से आ जाये और दीदी को बाइक पर बिठा कर निकल पड़ा।
घंटे भर में हम शहर पहुंच गए अब दीदी के चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कुराहट थी और वो भी 3 साल बाद घर से बाहर निकल कर खुश थीं रास्ते मे ढेर सारी बातें करते हुए मैंने दीदी से पूछा कि खाना खाया की नही तो वो बोली कि बस खाना बनाने जा रही थी कि तुम आ गए उसके बाद मौका ही नही मिला मैंने बाइक एक रेस्टोरेंट के सामने रोकी और दीदी के साथ जा कर बैठ गया और वेटर आया तो मैंने दीदी से कहा आर्डर करो दीदी बोली मैं चार साल से गाँव मे रह कर सब भूल गयी हूँ तुम ही मंगवा लो जो भी खाना हो फिर मैंने याद करने की कोशिश की लास्ट टाइम जब हम फैमिली के साथ होटल आये थे तब दीदी ने शाही पनीर खाने की जिद की थी मैंने दो शाही पनीर आर्डर की और दीदी ने मेरी देख कर कहा संजय तुम्हे मेरी पसन्द याद है मैंने कहा याद तो नही थी दीदी पर याद किया तो याद आ गया फिर हमने खाना खाया और माँ के लिए खाना पैक करवा कर घर आ गए।
घर पहुंचते ही जैसे ही माँ ने दरवाजा खोला दीदी को देख कर खुशी से रो पड़ी और दोनों एक दूसरे के गले लग कर खूब रोयीं अपनी अपनी बेबसी पर, मेरा भी मन उदास था ये सब देख कर फिर मम्मी और दीदी ने एक दूसरे को अपने दुख दर्द बताये की कैसे उनकी ससुराल में उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जा रहा था और किस तरह से संजय ने जा कर वहां सबकी हालात टाइट कर दी फिर दीदी ने मम्मी को खाना खिलाया और तीन दिन वही रही हमने ढेर सारी बातें की 3-4 साल का अपना अपना किस्सा अपने अपने दुख और संघर्ष की कहानी बयां करने में ही ये तीन दिन कैसे गुजर गए कुछ पता नही चला फिर आखिरी दिन मैंने मम्मी और दीदी को बाजार ले जा कर थोड़ी सी शॉपिंग करवाई नये कपड़े चप्पलें और दीदी को कुछ मेकअप का सामान जो कि उनको शादी के बाद कभी नसीब नहीं हुआ था दीदी अब काफी खुश दिख रही थीं और वो मुझसे खासी प्रभावित भी थीं कि कैसे मैंने एक दिन में कितना कुछ बदल दिया उनकी जिंदगी में।
अगले दिन मुझे वापस दिल्ली जाना था मन तो नही था माँ और दीदी को छोड़ कर जाने का पर अभी बहोत कुछ ठीक करना था और उसके लिए पैसे की जरूरत थी और पैसों के लिए मुझे काम करना था अपनी नौकरी हासिल करनी थी तो दीदी ने भी डिसाइड किया कि अगले दिन वो अपनी ससुराल जाएंगी और फिर अगले दिन सुबह मैं और दीदी घर से निकल पड़े दीदी ने ससुराल फ़ोन कर दिया था तो उनका देवर उन्हें लेने आया था और मैं भी मम्मी को समझा कर की बस 6 महीने में सब ठीक हो जाएगा दिल्ली के लिए निकल पड़ा।
अगले हफ्ते मैंने आफिस जॉइन कर लिया और अब मेरा नियम था रोज सुबह शाम मम्मी और दीदी से फ़ोन पर बात करना और सारा दिन अपनी ड्यूटी बजाना ऐसे में ही चार महीने कब गुजर गए पता नही चला और एक दिन जब मैंने दीदी से शाम के वक़्त बात की तो एक खबर मिली पर मैं समझ नही पा रहा था कि वो खबर अच्छी है या बुरी दीदी ने बताया कि उनके पति की तबियत खराब है और डॉक्टर ने कैंसर बताया है ज्यादा शराब और सिगरेट पीने की वजह से लिवर का कैंसर है और उनके ससुर खेत बेंच कर उनका इलाज करवा रहे हैं ….. मैंने कहा दीदी मैं कुछ मदद कर दूं पैसों की तो उन्होंने ये कहा कि अभी तुम्हे पैसों की जरूरत है अपना भविष्य बनाने के लिए और ये तो वैसे भी ठीक नही होंगे मैं बेवजह परेशान ना होऊं और मुझे कही से नही लगा कि दीदी इस सब से ज्यादा परेशान या दुखी हैं फिर भी मैं हर रोज उनसे हाल चाल लेता रहा और कोई तीन महीने बाद ये पता चला कि जीजा की मौत हो गयी है मैं छुट्टी ले कर घर आया और मम्मी के साथ दीदी की ससुराल गया जीजा के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ और फिर जब मैं वापस दीदी के घर आया तो वहाँ ड्रामा चल रहा था दीदी की वो चुड़ैल सास दीदी को बुरी तरह से गालियां बकते हुए कहा रही थी कि ये मेरे बेटे को खा गई ये डायन है मैं इसे अपने घर मे नही रखूंगी ये सब सुन कर मेरा दिमाग खराब हो गया मैंने दीदी की सास को फटकारते हुए कहा बहुत हुआ तेरा ड्रामा तुम जैसे जानवरों के पास मुझे भी नही रखना अपनी बहन को और मैं अपनी बहन को अपने साथ ले जा रहा हूँ माँ ने मुझे समझाने की कोशिश की तो मैंने उन्हें भी झिड़क दिया कि एक बार अपने मन की कर के दीदी की जिंदगी नर्क कर चुकी हो अब मैं किसी की नही सुनूंगा वैसे भी जिस इंसान से ब्याहा था वो तो मर गया अब दीदी यहां एक सेकेंड नही रहेगी और मैं दीदी और माँ के ले कर शहर आ गया।
घर मे थोड़ा सा तनाव था पर मेरे आगे किसी की एक नही चली मैंने फैसला सुना दिया कि हम है घर बेंच कर दिल्ली में ही कोई फ्लैट ले लेंगे और हम सब अब वही चल कर रहेंगे।
मैंने रवि को कॉल कर के सारी स्थिति बताई और उसे घर बिकवाने की बात कर के दीदी को घर छोड़ कर वापस दिल्ली आ गया 7 महीने नौकरी कर के मेरे पास 5-6 लाख रुपये इकठ्ठे हो गए थे और अब तो मैं खुद ही बैंक का मैनेजर था तो मैंने जल्दी ही एक फ्लैट खरीद लिया लोन ले कर और उधर रवि ने भी हमारा घर एक ग्राहक को दिखा कर 60 लाख में सौदा करवा दिया फिर एक दिन मैं आखिरी बार अपने शहर आया और घर की रजिस्ट्री कर के चल पड़ा मम्मी और दीदी को साथ ले कर अपनी जिंदगी के नए सफर पर जहां अब शायद दुख नही खुशियां थी हम सब के जीवन में।
मैंने एक 3bhk फ्लैट लिया था जिसकी कीमत 80 लाख थी पर अभी मेरे पास 60 लाख रुपये थे और मैं टेंशन फ्री था मेरी 80000 सैलेरी में 15000 हर महीने फ्लैट की किश्त थी और बाकी के 65000 रुपये हम तीन प्राणियों के लिए काफी थे फिर जिंदगी चलने लगी रास्ते पर मैं दिन भर अपनी ड्यूटी करता और शाम को मम्मी और दीदी के साथ वक़्त बिताता दीदी के चेहरे की रौनक धीरे धीरे वापस आने लगी थी और वो अब पहले से काफी बेहतर और खुश दिखने लगी थीं लगता ही नही था कि इनके पति की मौत हुई है वो शायद इसलिए कि दीदी ने कभी उसे पति के रूप में स्वीकार ही नही किया था वो बस मजबूरी में उसके साथ जिंदगी गुजार रही थीं ….. फिलहाल सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन अचानक से माँ की तबियत खराब हो गयी और एक बार फिर हमारी खुशियां खत्म सी हो गईं मैंने काफी इलाज करवाया पर माँ की बीमारी का पता नही चला और वो दिन ब दिन सूखती चली गईं और फिर एक दिन मैं आफिस में था तो दीदी का कॉल आया और वो रोते हुए बोली संजय जल्दी आओ मॉ अब नही रही …….

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To be continued

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