मेरी बहन कविता

दुनिया में कुछ बाते कब और कैसे हो जाती है ये कहना बहुत मुश्किल है. जिसके बारे में आपने कभी कल्पना भी नहीं की होती वैसी घटनाये आपके जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख देती है. बात इधर उधर घुमाने की जगह सीधा कहानी पर आता हूँ. मैं मुंबई में रहता था और वही एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करने के साथ कंप्यूटर कोर्स भी करता था. मेरी बड़ी बहन भी वही रहती थी रहती थी. उसका पति एक प्राइवेट फर्म में काम करता था. अच्छा कमाता था, और उसने एक छोटा सा एक बेडरूम वाला फ्लैट ले रखा था. उनका घर छोटा होने के कारण मैं वहां नहीं रह सकता था. मगर उनके घर के पास ही मैंने भी एक कमरा किराये पर ले लिया था. मेरी बहन का नाम कविता था. शादी के 4 साल बाद भी उसे कोई बच्चा नहीं था और शायद होने की सम्भावना भी नहीं थी. क्योंकि उसका पति थोड़ा सनकी किस्म का था . उसके दिमाग में पता नहीं कहाँ से अमीर बन ने का भूत सवार हो गया था. हालाँकि ये हमारे परिवार की जरुरत थी. वो हर समय दुबई जाने के बारे में बाते करता रहता था. हालाँकि दीदी उसकी इन बातो से कभी-कभी चिढ जाती थी मगर फिर भी वो उसके विचारो से सहमत थी. फिर एक दिन ऐसा आया जब वो सच में दुबई चला गया. वहाँ उसे एक फर्म में नौकरी मिल गई थी. तब मैंने किराया बचाने और दीदी की सुविधा के लिए अपना किराये का कमरा छोड़ कर अपने आप को दीदी के एक बेडरूम फ्लैट में शिफ्ट कर लिया. ड्राइंग रूम के एक कोने में रखा हुआ दीवान मेरा बिस्तर बना और मैं उसी पर सोने लगा . दीदी अपने बेडरूम में सोती थी. एक ओर साइड में रसोइ और दूसरी तरफ लैट्रीन और बाथरूम. रात में दीदी बेडरूम के दरवाजे को पूरी तरह बंद नहीं करती थी केवल सटा भर देती थी. अगर दरवाजा थोड़ा सा भी अलग होता था तो उसके कमरे की नाईट बल्ब की रौशनी मुझे ड्राइंग रूम में भी आती थी. दरवाजे के खुले होने के कारण मुझे रात को जब मुठ मारने की तलब लगती थी तब मुझे बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती थी. क्योंकि हमेशा डर लगा रहता था की पता नहीं दीदी कब बाहर आ जायेगी. लड़कियो के प्रति आकर्षण तो शुरू से था. आस-पास की लड़कियो और शादी शुदा औरतो को देख-देख कर मूठ मारा करता था. दीदी के साथ रहते हुए मैंने इस बात को महसूस किया की मेरी दीदी वाकई बहुत ही खूबसूरत औरत है. ऐसा नहीं था की दीदी शादी के पहले खूबसूरत नहीं थी. दीदी एकदम गोरी चिट्टी और तीखे नाक-नक्शे वाली थी. पर दीदी और मेरे उम्र के बीच करीब 6 से 7 साल का फर्क था, इसलिए जब दीदी कुंवारी थी तो मेरी उतनी समझदारी ही नहीं थी की मैं उनकी सुन्दरता को समझ पाता या फिर उसका आकलन कर पाता. फिर शादी के बाद दीदी अलग रहने लगी थी. अब जब मैं जवान और समझदार हो गया था और हम दुबारा साथ रहने लगे तो मुझे अपनी दीदी को काफी नजदीक से देखने का अवसर मिल रहा था और यह अहसास हो रहा था की वाकई मेरी बहन लाखो में एक हैं. शादी के बाद से उसका बदन थोड़ा मोटा हो गया था. मतलब उसमे भराव आ गया था. पहले वो दुबली पतली थी मगर अब उसका बदन गदरा गया था. शायद ये उम्र का भी असर था क्योंकि उसकी उम्र भी 31-32 के आस पास की हो गई थी . उसके गोरे सुडौल बदन में गजब का भराव और लोच था. चलने का अंदाज बेहद आकर्षक और क्या कह सकते है कोई शब्द नहीं मिल रहा शायद सेक्सी था. कभी चुस्त सलवार कमीज़ तो कभी साडी ब्लाउज जो भी वो पहनती थी उसका बदन उसमे और भी ज्यादा निखर जाता था . चुस्त सलवार कुर्ती में तो हद से ज्यादा सेक्सी दिखती. दीदी जब वो पहनती थी उस समय सबसे ज्यादा आकर्षण उसकी टांगो में होता था . सलवार उसके पैरो से एकदम चिपकी हुई होती थी. जैसा की आप सभी जानते है ज्यादातर अपने यहाँ जो भी चुस्त सलवार बनती है वो झीने सूती कपड़ो की होती है. इसलिए दीदी की सलवार भी झीने सूती कपड़े की बनी होती थी और वो उसके टांगो से एकदम चिपकी हुई होती. कमीज़ थोरी लम्बी होती थी मगर ठीक कमर के पास आकर उसमे जो कट होता था असल में वही जानलेवा होता था. कमीज़ का कट चलते समय जब इधर से उधर होता तो चुस्त सलवार में कसी हुई मांसल जांघे और चुत्तर दिख जाते थे. कविता दीदी की जांघे एकदम ठोस, गदराई और मोटी कन्दली के खंभे जैसी थी फिर उसी अनुपात में चुत्तर भी थे. एकदम मोटे मोटे , गोल-मटोल गदराये, मांसल और गद्देदार जो चलने पर हिलते थे. सीढियों पर चढ़ते समय कई बार मुझे कविता दीदी के पीछे चलने का अवसर प्राप्त हुआ था. सीढियाँ चढ़ते समय जब साडी या सलवार कमीज में कसे हुए उनके चुत्तर हिलते थे, तो पता नहीं क्यों मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती थी. इसका कारण शायद ये था की मुझे उम्र में अपने से बड़ी और भरे बदन वाली लड़कियोँ या औरते ज्यादा अच्छी लगती थी. सीढियों पर चढ़ते समय जब कविता दीदी के तरबूजे के जैसे चुत्तर के दोनों फांक जब हिलते तो पता नहीं मेरे अन्दर कुछ हो जाता था. मेरी नज़रे अपने आप पर काबू नहीं रख पाती और मैं उन्हें चोर नजरो से देखने की कोशिश करता. पीछे से देखते समय मेरा सामना चूँकि दीदी से नहीं होता था इसलिए शायद मैं उनको एक भरपूर जवान औरत के रूप में देखने लगता था और अपने आप को उनके हिलते हुए चूत्तरों को देखने से नहीं रोक पाता था. अपनी ही दीदी के चुत्तरों को देखने के कारण मैं अपराधबोध से ग्रस्त हो शर्मिंदगी महसूस करता था. कई बार वो चुस्त सलवार पर शोर्ट कुर्ती यानि की छोटी जांघो तक की कुर्ती भी पहन लेती थी. उस दिन मैं उनसे नज़रे नहीं मिला पाता था. मेरी नज़रे जांघो से ऊपर उठ ही नहीं पाती थी. शोर्ट कुर्ती से झांकते चुस्त सलवार में कसे मोटे मोटे गदराये जांघ भला किसे अच्छे नहीं लगेंगे भले ही वो आपकी बहन के हो. पर इसके कारण आत्मग्लानी भी होती थी और मैं उनसे आंखे नहीं मिला पाता था. दीदी की चुत्तर और जांघो में जो मांसलता आई थी वही उनकी चुचियों में भी देखने को मिलती थी. उनके मोटे चुत्तर और गांड के अनुपात में ही उनकी चुचियाँ भी थी. चुचियों के बारे में यही कह सकते है की इतने बड़े हो की आपकी हथेली में नहीं समाये पर इतने ज्यादा बड़े भी न हो की दो हाथो की हथेलियों से भी बाहर निकल जाये. कुल मिला कर ये कहे तो शरीर के अनुपात में हो. कुछ १८-१९ साल की लड़कीयों जो की देखने में खूबसूरत तो होंगी मगर उनकी चुचियाँ निम्बू या संतरे के आकार की होती है. जवान लड़कियोँ की चुचियों का आकार कम से कम बेल या नारियल के फल जितना तो होना ही चाहिए. निम्बू तो चौदह-पंद्रह साल की छोकरियों पर अच्छा लगता है. कई बार ध्यान से देखने पर पता चल पाता है की पुशअप ब्रा पहन कर फुला कर घूम रही है. इसी तरह कुछ की ऐसी ढीली और इतनी बड़ी-बड़ी होगी की देख कर मूड ख़राब हो जायेगा. लोगो का मुझे नहीं पता मगर मुझे तो एक साइज़ में ढली चूचियां ही अच्छी लगती है. शारीरिक अनुपात में ढली में हुई, ताकि ऐसा न लगे की पुरे बदन से भारी तो चूचियां है या फिर चूची की जगह पर सपाट छाती लिए घूम रही हो. सुन्दर मुखड़ा और नुकीली चुचियाँ ही लड़कियों को माल बनाती है. एकदम तीर की तरह नुकीली चुचिया थी दीदी की. भरी- भरी, भारी और गुदाज़. गोल और गदराई हुई. साधारण सलवार कुर्ती में भी गजब की लगती थी. बिना चुन्नी के उनकी चूचियां ऐसे लगती जैसे किसी बड़े नारियल को दो भागो में काट कर उलट कर उनकी छाती से चिपका दिया गया है. घर में दीदी ज्यादातर साड़ी या सलवार कमीज़ में रहती थी . गर्मियों में वो आम तौर पर साड़ी पहनती थी . शायद इसका सबसे बड़ा कारण ये था की वो घर में अपनी साड़ी उतार कर, केवल पेटीकोट ब्लाउज में घूम सकती थी. ये एक तरह से उसके लिए नाईटी या फिर मैक्सी का काम करता था. अगर कही जाना होता था तो वो झट से एक पतली सूती साड़ी लपेट लेती थी. मेरी मौजूदगी से भी उसे कोई अंतर नहीं पड़ता था, केवल अपनी छाती पर एक पतली चुन्नी डाल लेती थी. पेटीकोट और ब्लाउज में रहने से उसे शायद गर्मी कम लगती थी. मेरी समझ से इसका कारण ये हो सकता है की नाईटी पहनने पर भी उसे नाईटी के अन्दर एक स्लिप और पेटीकोट तो पहनना ही पड़ता था, और अगर वो ऐसा नहीं करती तो उसकी ब्रा और पैन्टी दिखने लगते, जो की मेरी मौजूदगी के कारण वो नहीं चाहती थी. जबकि पेटीकोट जो की आम तौर पर मोटे सूती कपड़े का बना होता है एकदम ढीला ढाला और हवादार. कई बार रसोई में या बाथरूम में काम समय मैंने देखा था की वो अपने पेटीकोट को उठा कर कमर में खोस लेती थी जिससे घुटने तक उसकी गोरी गोरी टांगे नंगी हो जाती थी. दीदी की पिंडलियाँ भी मांसल और चिकनी थी. वो हमेशा एक पतला सा पायल पहने रहती थी. मैं कविता दीदी को इन्ही वस्त्रो में देखता रहता था मगर फिर भी उनके साथ एक सम्मान और इज्ज़त भरे रिश्ते की सीमाओं को लांघने के बारे में नहीं सोचता था. वो भी मुझे एक मासूम सा लड़का समझती थी और भले ही किसी भी अवस्था या कपड़े में हो , मेरे सामने आने में नहीं हिचकिचाती थी. ड्राइंग रूम में बैठे हुए रसोई में जहॉ वो खाना बनाती थी वो सब ड्राइंग रूम में रखे अल्मीराह में लगे आईने (mirror) में स्पष्ट दिखाई पड़ता था. कई बार दीदी पसीना पोछने के लिए लिए अपने पेटीकोट का इस्तेमाल करती थी. पेटीकोट के निचले भाग को ऊपर उठा कर चेहरे का पसीने के पोछते हुए मैंने कई बार मैंने आईने में देखा. पेटीकोट के निचले भाग को उठा कर जब वो थोड़ा तिरछा हो कर पसीना पोछती थी तो उनकी गोरी, बेदाग, मोटी जांघे दिख जाती थी.

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